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‘वैकोम सत्याग्रह’ को 100 वर्ष पूरे:

परिचय: 

  • ठीक 100 वर्ष पहले, केरल का वैकोम शहर, जो उस समय त्रावणकोर रियासत में स्थित था, अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के खिलाफ एक ऐतिहासिक अहिंसक आंदोलन का केंद्र बन गया।
  • 30 मार्च, 1924 से 23 नवंबर, 1925 तक 604 दिनों (20 महीने) तक चलने वाले वैकोम सत्याग्रह ने पूरे भारत में मंदिर प्रवेश आंदोलनों की शुरुआत की।
  • उस समय, उत्पीड़ित वर्ग के लोगों, विशेषकर एझावाओं को, वैकोम महादेव मंदिर के आसपास की चार सड़कों पर चलने से प्रतिबंधित कर दिया गया था।

वैकोम सत्याग्रह के बारे में:

  • वायकोम सत्याग्रह (1924-1925) एक प्रकार का गांधीवादी आन्दोलन था, जो त्रावणकोर के एक मन्दिर के पास वाली सड़क के उपयोग से सम्बन्धित था, 30 मार्च, 1924 को शुरू हुआ था।
  • इस आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस नेता टी.के. माधवन, जो स्वयं एक एझावा थे, के. केलप्पन तथा के. पी. केशव मेनन ने किया था।
  • उल्लेखनीय है कि गांधीजी और त्रावणकोर राज्य के तत्कालीन पुलिस आयुक्त डब्ल्यू एच पिट के बीच सक्रिय परामर्श के बाद 30 नवंबर, 1925 को आधिकारिक तौर पर हड़ताल वापस ले ली गई।
  • समझौता फार्मूले में सभी कैदियों की रिहाई और मंदिर के उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी किनारों पर सड़कों को खोलने की शर्त रखी गई। हालांकि, सड़क का पूर्वी प्रवेश द्वार ऊंची जातियों के लिए आरक्षित रखा गया।
  • वैकोम सत्याग्रह या मंदिर प्रवेश का मुद्दा सबसे पहले एझावा नेता टीके माधवन ने 1917 में अपने अखबार देशाभिमानी के संपादकीय में उठाया था। वर्ष 1920 तक, गांधी के असहयोग आंदोलन की सफलता से प्रेरित होकर, उन्होंने और अधिक प्रत्यक्ष तरीकों की वकालत करना शुरू कर दिया।
  • इस सत्याग्रह के समर्थन में पूरे देश से स्वयं सेवक वायकोम पहुँचने लगे। पंजाब से एक अकाली जत्था तथा ई. वी. रामास्वामी नायकर, जिन्हें ‘पेरियार’ के नाम से जाना जाता था, ने मदुरै से आये एक दल का नेतृत्व किया।

वैकोम सत्याग्रह का कारण/एझावा समुदाय का उदय:

  • उल्लेखनीय है कि उस समय, त्रावणकोर में कुछ सबसे कठोर और अमानवीय मानदंडों के साथ, पूरे भारत में जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता व्याप्त थी। एझावा और पुलायु जैसी निचली जातियों को अपवित्र माना जाता था और उन्हें उच्च जातियों से दूर करने के लिए विभिन्न नियम बनाए गए थे।
  • इनमें केवल मंदिर में प्रवेश पर ही नहीं, बल्कि मंदिरों के आसपास की सड़कों पर चलने पर भी प्रतिबंध शामिल था।
  • इस समय के दौरान, एझावा “त्रावणकोर में सबसे शिक्षित और संगठित अछूत समुदाय” के रूप में पायी जाती थी। इस संबंध में सरकार की शिक्षा नीतियां महत्वपूर्ण थीं।
  • हालांकि उस समय एक छोटा एझावा अभिजात वर्ग उभरना शुरू हो गया था लेकिन धार्मिक भेदभाव अभी भी व्याप्त था। जाति की निरंतर व्यापकता एवं भेदभाव ने एझावा समुदाय और ऐसे अन्य पिछड़े समुदायों के बीच महत्वपूर्ण उद्वेलन पैदा कर दिया, जिससे आंदोलन के लिए बीज बोए गए।

वैकोम सत्याग्रह का परिणाम और विरासत:

  • वैकोम सत्याग्रह एक उल्लेखनीय आंदोलन था, जो शत्रुतापूर्ण सामाजिक ताकतों, पुलिस कार्रवाई और 1924 में शहर के इतिहास की सबसे भीषण बाढ़ों में से एक के बीच 604 से अधिक दिनों तक चला।
  • सत्याग्रह में जातिगत आधार पर पहले की अनदेखी एकता भी देखी गई, जो इसकी निरंतर लामबंदी के लिए महत्वपूर्ण थी।
  • लेकिन अंतिम समझौते ने कई लोगों को निराश किया। मुख्य रूप से, पेरियार, जिन्होंने कहीं अधिक शानदार परिणाम की कल्पना की थी, इस मुद्दे पर गांधी जी से अलग हो गए।
  • नवंबर 1936 में, त्रावणकोर के महाराजा ने ऐतिहासिक मंदिर प्रवेश उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जिसने राज्य के मंदिरों में हाशिए की जातियों के प्रवेश पर सदियों पुराने प्रतिबंध को हटा दिया।
  • उल्लेखनीय है कि विरोध के प्रभावी उपकरण के रूप में सविनय अवज्ञा के गांधीवादी तरीकों के प्रदर्शन के साथ-साथ, यह वाइकोम सत्याग्रह की बड़ी सफलता थी। ऐसे में अपने सीमाओं के बाद भी वैकोम सत्याग्रह ने भारत में राजनीतिक मुद्दों में अस्पृश्यता को सबसे आगे ला दिया था।

स्रोत – इंडियन एक्सप्रेस

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